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कश्मीर - 1

Posted On: 9 Apr, 2015 Others में

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कश्मीर…..कश्मीर……..कश्मीर………..
कश्यप ऋषि के नाम पर बना संस्कृत शब्द “कश्मीर” आज इस्लाम और हिन्दुत्व की नाक का प्रश्न बन चुका है।

इस्लाम कहता है कश्मीर भारत का हिस्सा है ही नहीं जबकि हिन्दुत्व कश्मीर को माथे पर सजाये बैठा है। अगर ये हटा तो भारत का मस्तक छिन्न हो जाएगा।।।।।।।।

आखिर कश्मीर क्या बला है??? अब इतिहास को क्या खंगालूं क्योंकि इतिहास ढूँढने पर कल्हण की राजतरंगणी, शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठ और बौद्ध विहार दृष्टिगोचर हो रहे हैं फिर उसके बाद वही बारह सौंवी शताब्दी से इस्लाम का खून खराबा और कश्मीरी पंडितों के नाम के आगे बट्ट, गनी, सईद, लोन, सज्जाद, खान आदि शब्दों का उल्लेख मिलने लगता है।

लेकिन इन सबके बावजूद शेष भारत के मुक़ाबले कश्मीर सबसे शांत छवि रखता है सारे भारत में आग लगी होती है, कत्लेआम हो रहे होते हैं, राज्यों की जीत, लूटपाट और व्यावसायिक संधियाँ हो रही होती हैं लेकिन इन सबसे दूर कश्मीर में हल्के से प्रतिरोध के बाद वहाँ इस्लाम का ही स्वरूप बदल कर पीरों, मजारों और सूफियों का साम्राज्य हो चुका होता है।

धर्मों की लड़ाई से दूर ये हिमालय की श्रेणी का सबसे उन्नत हिस्सा धरती के स्वर्ग के रूप में सुविख्यात हो जाता है।
सरल और भोले हृदय वाले कश्मीरी, सियासतों से दूर पश्तो-डोगरी की लुभावनी धुनों और संतूर की ध्वनि से दुनिया का ध्यान आकृष्ट करते हैं, विश्व की अद्भुत हस्तशिल्प कला और उन्नत निरोगी जीवन शैली से दुनिया का परिचय कराते हैं।

आजादी के ठीक पहले तक कश्मीर का इतिहास सबसे शांत, निरपेक्ष, सरल, सहृदय, सौहार्द, उन्नत अर्थव्यवस्था, सर्वाधिक जीवन प्रत्याशा, सौम्य जीवनी और प्राकृतिक नैसर्गिकता का आईना रहता है।

यहाँ तक की 1947 की भारत को बांटने की चाल से भी बच निकलने वाला कश्मीर अंततोगत्वा धर्मों की कुटिल चालों में फंस कर ऐसी तबाही का रुख कर लेता है जिसका हश्र अब तक भविष्यविहीन है…….

भारत और पाकिस्तान की सुरक्षा खर्च का सर्वाधिक हिस्सा निगलने वाला कश्मीर आखिर किसके लाभ का मोहरा है?????
राजा हरि सिंह और उनके मंत्री शेख अब्दुल्ला की नेपाल – भूटान जैसी संप्रभुता पर आखिर आघात किसने किया था??????

जेहन बेचैन है…….
और सवाल का जवाब वो पाकिस्तानी कबायली सैनिक दे रहे हैं जिनकी फौज 20 अक्तूबर 1947 को कश्मीर रौंदने के लिए बढ़ी चली आ रही थी।
फिर आनन – फानन में 26 अक्तूबर 1947 को कश्मीर का भारत में विलय और भारतीय सैनिकों का कश्मीर में प्रवेश कर बचे हुये कश्मीर को सुरक्षित रखने के जतन में खुद को झोंक देना।

शायद वो सिलसिला आज तक जारी है। आज भी भारत के सैनिक अपनी पूरी नौकरी का एक चौथाई हिस्सा कश्मीर के नाम पर दे कर आते हैं और उनमे से कई अभागे अपनी जिंदगी दे जाते हैं। कैसी विडम्बना है इतनी जानें लेने के बाद भी कश्मीर जस का तस है, वहाँ के भोले और सीधे सादे नागरिक धर्म के चश्मे से अंधे होकर खुद को सीमापार प्रायोजित चरमपंथ और आतंकवाद की पनाह में सुरक्षित समझते हैं।
विदेशी मीडिया, मानवाधिकार समूह, संयुक्त राष्ट्र आदि सब अपनी पैनी नजरें गड़ाए भारत प्रशासित कश्मीर की एक एक गतिविधि को परखते रहते हैं और मनचाही अनर्गल-मिथ्या-अतिवादी परिचर्चाओं के आयोजन में मशगूल रहते हैं।
मानों विश्व का सबसे ज्वलंत मुद्दा कश्मीर ही हो………

कितना आहत करता है अपने कश्मीर का ये वर्तमान स्वरूप ।।।।।।।।।।।।

चलो आज हम भी कश्मीर की असलियत को परख लेते हैं कि आखिर पाकिस्तान की खालिस्तान बनाने का प्रलोभन देकर कभी सिक्खों को उनके वतन से जुदा करने की चाल के चकनाकूर हो जाने के बाद कश्मीर के जरिये भारत को अस्थिर करने का ख्याल पाकिस्तानी राजनीति में कैसे आया…….

1965, 1971 और कारगिल युद्ध 1999 में भी भारतीय कश्मीरी, भारत के प्रति विद्रोही नहीं था लेकिन विदेशी पैसे पर जीवित चरमपंथियों के द्वारा सत्रह साल के लड़के की मौत पर भड़कायी हिंसा ने भोले कश्मीरियों की आँखों पर विनाश का पर्दा डाल दिया है।
पता नहीं किस खुशी, उल्लास और स्वायत्ता की चाह में जनता के हाथों में पेट्रोल बम, पत्थर, विदेशी हथियार थमा कर पुलिस और सैनिकों के पीछे दौड़ा दिया जाता था और पुलिस द्वारा आत्मरक्षा में चलायी गयी गोली पर बी॰बी॰सी॰ के पत्रकार, मानवाधिकार संगठन नमक मिर्च लगा कर कहानियाँ छापने लगते थे।

जम्मू कश्मीर की यथार्थता को भला को कैसे ये विदेशी व्यवसायी या स्वयंभू न्यायाधीश समझ सकते हैं????
इन मुद्दों के जरिये ही तो विश्व की दो बड़ी सामरिक शक्तियाँ न्यूक्लियर और बेहद विनाशक हथियार खरीदेंगे।।।।।।।।।।

जम्मू और कश्मीर की 100 प्रतिशत सियासत के आज तीन टुकड़े हो चुके हैं, जिसमें से 30 प्रतिशत हिस्सा गिलगित-बाल्टिस्तान और आजाद कश्मीर के रूप में पाकिस्तान के पास है, 10 प्रतिशत हिस्सा अकसाई चीन व काराकोरम श्रेणी के रूप में चीन के अधीन है और भारत के पास 60 प्रतिशत हिस्सा है।

1941 की जनगणना के अनुसार जम्मू कश्मीर की कुल जनसंख्या 39,45,000 थी जिसमें 76 प्रतिशत मुसलमान व 24 प्रतिशत हिन्दू अर्थात सिक्ख-बौद्ध-डोगरा-कश्मीरी पंडित आदि थे और आज की वर्तमान जनसंख्या करीब 1,59,99,272 है जिसमें भारत व पाकिस्तान कश्मीर की जनसंख्या का ही आंकड़ा मिल सका है क्योंकि अकसाई चीन का इलाका सभी तरह संगठनों व मीडिया के लिए चीनी सरकार ने निषेध कर रखा है।

भारत प्रशासित 60 प्रतिशत कश्मीर के भी तीन हिस्से हैं पहला कश्मीर जिसमें 69,07,622 की आबादी का 95 प्रतिशत मुस्लिम है और बाकी 5 प्रतिशत हिन्दू, दूसरा हिस्सा जम्मू जिसमें 53,50,811 की आबादी में 30 प्रतिशत मुस्लिम और 70 प्रतिशत हिन्दू हैं और तीसरा हिस्सा लद्दाख है जिसमें 2,90,492 की आबादी में कारगिल के 45 प्रतिशत शिया मुस्लिम व 55 प्रतिशत लद्दाखी बौद्ध हिन्दू हैं।

अब पाकिस्तान प्रशासित 30 प्रतिशत कश्मीर के भी तीन हिस्सों को देखा जाये तो आजाद कश्मीर के 25,80,000 सूफी मुसलमान तथा गिलगित-बाल्टिस्तान के 8,70,347 डोगरा मुसलमानों पर नज़र जाती है जबकि चीन प्रशासित कश्मीर की सूरत का कोई अंदाज़ा ही नहीं लिया जा सकता।

अब मुद्दा आता है की भारत के 60 प्रतिशत कश्मीर में लगभग 1,25,48,925 निवासी हैं जबकि पाक व चीन अधिकृत 40 प्रतिशत कश्मीर की कुल जनसंख्या 34,50,347 में ही सिमट जाती है।

रोज रोज कश्मीर मुद्दे पर सियासत करने वाले मूर्ख नेताओं जरा इस तस्वीर को अपनी अंधी अक्ल के सामने रखो की भारत प्रशासित कश्मीर में आखिर कौन सी जीवन सुलभ सुविधाएं दी जा रही हैं कि यहाँ की जनसंख्या 1941 में 23,67,000 से लगभग चौगुनी हो चुकी है जबकि 15,78,000 की जनसंख्या वाले उस पार के कश्मीर को दुगुनी आबादी बढ़ाने में लाले पड़ गए…….

खैर मुझे क्या??????

मै क्यों सिर दर्द मोल लूँ की भारत का मुसलमान इतना सुखी क्यों है, इतना पढ़ा लिखा, लंबी आयु का धनी, मानवाधिकारों के प्रति जागरूक, अच्छी सम्मानपूर्ण जीवन जीने वाला, नौकरी, चुनाव, खेलकूद, सेना, शिक्षा, सेवा आदि में समान भागीदारी का अवसर प्राप्त करने वाला क्यों है????
जबकि ठीक इसके दूसरी तरफ के देशों का मुसलमान मुहाजिर, शिया, सुन्नी, कबायली आदि में बंटा इतना लाचार, अपमानित, संवेदनाहीन, और जीवन की मूल सुविधाओं को तरसने वाला क्यों है????? जिन्हें चरमपंथियों व विदेशी सेनाओं की बंदूकों के साये में जीना पड़ रहा है, जिनके गिलगित और बाल्टिस्तान में सेना व आतंकियों के प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं, जहां से अफीम चरस का व्यापार चलाया जा रहा है, जहां के युवा अपनी जिंदगी का 60 प्रतिशत हिस्सा गोलियों के छर्रों और बमों के धुएँ में बिता रहे हैं, जहां मानवाधिकार संगठनों, बी॰ बी॰ सी॰ जैसे विदेशी मीडिया को मसालेदार खबरें बनाने के लिए घुसने भी नहीं दिया जाता, जहां औरतों के अस्तित्व की कोई पहचान नहीं है, जहां की घरेलू हस्तशिल्प कला और कश्मीरी अर्थव्यवस्था अपनी दम तोड़ चुकी है, जहां दुधमुहें बच्चों को बुखार तक से होने वाली मौत से बचाने के लिए कोई अस्पताल नहीं है और दूर शहरों के अस्पताल तक ले जाने के लिए सड़कों का नामोनिशान नहीं है।
2005 के कश्मीर भूकंप और 2014 की कश्मीर घाटी की बाढ़ की तबाही में भारतीय पक्ष के हताहतों की संख्या तो सामने है लेकिन सरहद पार के कश्मीर की गुमनाम मौतों का कोई आंकड़ा नहीं है जिन्हें आज भी सुपुर्दे खाक होने की दरकार है……….

इतनी विषमताएं होते हुये भी चलो मान लिया की कश्मीर पर पाकिस्तान चिंता जायज है, कि वाकई भारतीय सेना कश्मीरी बाशिंदों पर बहुत जुल्म कर रही है जिसकी वजह से कश्मीरी जनता त्रस्त है तो जरा इन्हीं भारतीय सैनिकों की मौजूदगी और त्वरित राहत कार्यों से बचे लाखों कश्मीरियों के जीवन बचने के आंकड़े भी पेश कर दो।

खामोश हो गए होगे तुम चरमपंथियों और तुम्हारे आका भी क्योंकि ठीक उसी वक़्त दूसरी तरफ तुम, बजाए पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की निरीह जानों को बचाने के, भारत में आतंकियों और चरमपंथियों की घुसपैठ कराने में मशगूल थे।
वो सेनाएँ जो अपने उत्तराखंड में दसियों हज़ार जानों को नहीं बचा पायी थी लेकिन भारत के कश्मीर में पंजाब के गुरुद्वारों की औरतों से रोटियाँ सिंकवा कर भूखे कश्मीर को जिला रही थी और हजारों हेलीकाप्टरों की रात दिन की उड़ान की बदौलत एक एक कश्मीरी को सुरक्षित किया जा रहा था. उत्तराखंड से भयानक त्रासदी को महज़ कुछ सौ मौतों में ही सीमित कर दिया था।

चलो मैं भी कहता हूँ कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा वोटिंग करा ली जाय, तो जम्मू कश्मीर के तीन हिस्सों में से जम्मू (26% भूभाग) और लद्दाख (59% भूभाग) की हिन्दू व शिया बहुल आबादी किसी भी हाल में पाकिस्तान के झांसे में न आकर भारत के साथ ही रहेगी और बची कश्मीर घाटी (15% भूभाग) आजाद कश्मीर का हिस्सा हो जाएगा यानि भारत के चंगुल से छूट कर पाकिस्तान की स्वायत्ता वाला मुक्त राष्ट्र।
कितना अच्छा लगेगा न कश्मीर के मुसलमानों को, चरमपंथी नेताओं को, लश्कर-तालिबान- आई॰एस॰आई॰एस॰ के जेहादी संतुष्ट हो जाएँगे, पाकिस्तान से हुक्म देते आकाओं को आराम मिल जाएगा। पाकिस्तानी आर्मी के पास भी अब भारत से लड़ने का कोई मुद्दा नहीं बचेगा और वो बेहतर तरीके से बलूचिस्तान के विद्रोही कबायलियों को खत्म कर सकेगी।

शायद, अमन और चैन हो जाएगा भारत में भी क्योंकि जितना पैसा और सैन्य ऊर्जा हम कश्मीर के गद्दारों को संतुष्ट रखने में और सुख सुविधाएं मुहैया कराने में खर्च कर रहे हैं वो अब देश की तरक्की और रोजगार के अवसर बढ़ाने में इस्तेमाल किए जा सकेंगे।

लेकिन,

कहीं न कहीं कश्मीर की भोली 95% निरपेक्ष जनता की इस षडयंत्र में फंस कर होने वाली दुर्दशा का दुःस्वप्न हमारे भी दिल में टीस पैदा कर रहा है कि आखिर 5% विदेशी वित्त पोषित स्वार्थी अलगाववादियों चरमपंथियों के फैलाये जा रहे आत्मघाती भ्रम में लाखों बेकसूर ऋषि कश्यप के वंशज या भारतीय सूफियाना इस्लाम के अनुयायियों को तिल तिल कर मरने के लिए छोड़ देना इस भारतीय संस्कृति को आत्मसंतोष दे सकेगा?????

अलग राष्ट्र की मांग करना बहुत आसान होता है। चंद युवा लोगों को विद्रोही भावनाओं में फंसा कर आगजनी करवाओ, छोटे छोटे मुद्दों को गंभीर बता कर अनर्गल बहस करवाओ, जिन युवाओं के हाथों में पशमीना हस्तशिल्प की कमान, संतूर की सुमधुर तरंगे और जुबान से डोगरी गानों की कर्णप्रिय आवाज़ें आनी चाहिए थी उन युवाओं को खास षड्यंत्र के तहत उनकी मूल उन्नत अर्थव्यवस्था से भटकाया जा रहा है।
गिलगित – बाल्टिस्तान, कश्मीर, आजाद कश्मीर और सियाचिन मिलकर मान लो एक नया राष्ट्र बन भी जाता है तो क्या ये एक मुकम्मल राष्ट्र बन पाएगा???

किसी भी राष्ट्र की सबसे मुख्य जरूरत अनाज होती है…… उसके बाद भौगोलिक परिवेश, फिर रोजगार, तकनीकी, सैन्य प्रबंधन, जरूरत की चीजों की मांग व आपूर्ति हेतु आधारभूत संरचना, संचार साधन, जीवन प्रत्याशा स्थिर रखने के लिए विस्तृत चिकित्सा तंत्र आदि।।।।।।
इसके अलावा विश्व में सिर्फ भारत ही ऐसा राष्ट्र है जहां की भूमि पर सारी सुविधाएं स्वयंभू मौजूद हैं। किसी भी प्रकार की महामारी अथवा प्राकृतिक आपदा का सामना करने के लिए इस विलक्षण राष्ट्र की भौगोलिक व्यवस्था यहाँ के निवासियों को स्थानांतरण और दूसरी जलवायु में जाकर प्राण बचाने का मौका देती है जो कि विश्व के किसी भी अन्य राष्ट्र में संभव ही नहीं। यहाँ यदि राजस्थान का सूखा है तो पंजाब का अनाज वहाँ की भूख मिटा रहा है। यदि नेपाल के पानी से आती भयंकर बाढ़ की चपेट में बिहार है तो झारखंड और मध्य प्रदेश के जंगलों में सुरक्षित पनाहगाह भी है। यदि तटीय क्षेत्रों में सुनामी और चक्रवाती तूफान हैं तो महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि की सम जलवायु भी है। यदि बुंदेलखंड और मराठवाडा का सूखा है तो उसके निवासियों की प्यास बुझाने के लिए गंगा के मैदान और नागपुर जैसे उपजाऊ क्षेत्र भी हैं।

और शायद सबसे बड़ी यही वजह है की नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे स्वतंत्र देशों के नागरिक खुद को भारत की मुख्य भूमि में ज्यादा सुरक्षित मानते हैं और स्वयं को भारतीय नागरिक साबित करने की पुरजोर कोशिश करते हैं।

राष्ट्र एक जीवित इकाई है, ये भी प्राकृतिक झंझावातों से गुजरता है। कश्मीर के बाढ़ पीड़ित हों या आंध्र प्रदेश के समुद्री तूफान पीड़ित सबको पंजाब और उत्तर प्रदेश का गेहूं तथा छतीसगढ़ का चावल प्राणविहीन होने से बचा लेता है। पहाड़ों की विरल जलवायु में मानव जीवन समतल मैदानों के प्रयत्न से ही सुरक्षित रहता है ये बात कश्मीर के लाखों बाशिंदों द्वारा सबसिडी प्राप्त अनाज लेते वक्त समझना चाहिए। कश्मीर की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने वाले चरमपंथियों क्या भारत से अलग रहकर तुम पाकिस्तान की बेरोजगारी-ऋणात्मक अर्थव्यवस्था-राजनीतिक अनिश्चितता-आतंकियों-सेना के बीच पिसते देश से कोई उम्मीद रख पाओगे????

…..cont

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
April 11, 2015

श्री मान बहुत ही मेहनत से लिखा गया लेख में आपने कई प्रश्न उठाये हैं किसी राज नेता के पास इनका जबाब नहीं है आपका लेख सोचने पर विवश करता है डॉ शोभा

Shobha के द्वारा
April 11, 2015

श्री मान जी मैने रात को बैठ कर आपके लेख पर लम्बी प्रतिक्रिया दी थी आपने अतिउत्तम लेख लिखा है शोभा

ramyadav के द्वारा
May 1, 2015

एक खामोश आहट हिमालय के विनाश की कहानी लिख रही है…………….. और शायद मानवता के इतिहास का भी समापन लिखा जा रहा है……………. नियति का कालचक्र इन मूरखों के तर्कों और अनुसंधानों को मटियामेट कर रहा है………… आह शिव तुम्हारा भारत !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


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