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वन क्रांति - जन क्रांति

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स्वाइन फ्लू -2

Posted On: 2 Mar, 2015 Others में

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नवीन चिकित्सा इन सभी बीमारियों से लड़कर इनको जन्म देने वाले जीवों को मार कर शरीर को जीवित रखने की कला का प्रदर्शन करती है। उसका एक ही सिद्धान्त है दवाइयों के निर्धारित डोज़ द्वारा विषाणुओं – जीवाणुओं – कवकों को मार दो लेकिन इस पद्धति का परिणाम ये होता है की ये अल्पायु जीव अगले जीवन काल में इन दवाओं की प्रतिरोधक क्षमता विकसित करके सामने आ जाते हैं और उसी बीमारी का नया घातक रूप महामारी के तौर पर प्राण लेने लगता है।
लेकिन अपनी चिर जीवित सभ्यता के मूल सिद्धान्त की पड़ताल में एक ही सूत्र सामने आता है की हम किसी भी जीव को मारकर जीवित नहीं रह सकते हैं बल्कि उनके साथ सहअस्तित्व लिए खुद को सुरक्षित रखने के सतत आविष्कारों का सहारा लेना होगा।
फेफड़ों का कैंसर और अमाशय में अल्सर पैदा करने वाली आल आउट या हिट के धुएं से मलेरिया पैदा करने मच्छरों को मारकर डेंगू मच्छरों को जन्म देने से बेहतर नीम की सूखी पत्तीयों का धुआँ और मच्छरदानी होती थी। नालियों और ठहरे हुये पानी में जब तक हमारे घरों का साबुन, डिटाल और हारपिक नहीं पहुँचा था तब तक मच्छरों को नियंत्रित रखने वाली मछलियाँ हमारा अस्तित्व संभाले रहती थीं।

और इन परिस्थितियों को जन्म देने वाली अंधी जनसंख्या नीति का समर्थन करने वाले सत्तालोलुप धर्मांध नेताओं कभी गौर से नीम के पेड़ के नीचे खड़े होकर देखना. बरसात में निंबौरी से लाखों छोटे छोटे नीम पैदा होते हैं लेकिन अगले साल उस जगह सिर्फ एक या दो ही पेड़ खड़े नज़र आते हैं। कभी सोचा है क्यों?
अस्तित्व के संघर्ष में प्रकृति की बेहद जटिल व्यवस्था है। हर जीव के हिस्से में सीमित संसाधन हैं और जो इन संसाधनों को हासिल करने की लड़ाई में जीवित रहता है वही अगली पीढ़ी को जन्म दे पाता है। दवाओं और धन से बढ़ी क्षमता के बल पर हम जीवन प्रत्याशा को बढ़ाने में तो सक्षम हो सकते हैं लेकिन संसाधनों को उत्पन्न नहीं कर सकते। इसके लिए हमें प्रकृति पर ही निर्भर रहना है।
यदि आज हम अपने मस्तिष्क और नवीन आविष्कारों के दम पर मानव जीवन बचाने में महारथी हैं तो हमारा ये भी कर्तव्य है की इसको सीमित रखने का उपाय भी हमें ही करना है।
अगर हम जनसंख्या को सीमित रखने में असफल रहे तो इन सीमित संसाधनों को हासिल करने की लड़ाई में अपने ही बच्चों को आपस में लड़ा बैठेंगे। जीवित रहने की इस लड़ाई में न कोई पड़ोसी होगा, न कोई गैर धर्मी होगा और न ही कोई विदेशी होगा। वरन अपना ही खून होगा जो मर रहा होगा और जो मार रहा होगा।

संतानोत्पति और संभोग को प्रकृति प्रदत्त गुण समझने वाले मानवों….. सभ्यता की इस कड़ी में खुद को पुराने युग से उत्कृष्ट मानने वालों से ब्रह्मचर्य की आशा करना बेमानी है।
लेकिन इस नवीन युग में सभ्यता का चोला लपेटे इंसान क्या अपनी मूर्खता की वेदी में अपने बच्चों को अस्तित्व के संघर्ष में धकेलने को आतुर होगा????
जनसंख्या असंतुलन से उपजा पारिस्थितिक असंतुलन एक नए तरह के विनाश की भूमिका बांध रहा है।
प्रदूषण के विभिन्न प्रकार, वनों का ह्रास, जनसंख्या के दबाव से सीमेंट में बदलती धरती, भूमि के पानी का मूर्खता की हद तक दोहन और पर्यावरणीय ऋतु चक्र में हो रहे परिवर्तनों से न केवल कृषि प्रभावित हो रही है बल्कि कई तरह की नयी बीमारियाँ भी जन्म लेती जा रही हैं।

वर्तमान पीढ़ी को एक ठहराव की जरूरत है, आत्मविश्लेषण की आवश्यकता है। तुलना करनी है इतिहास से वर्तमान की। उन स्तंभों पर चिंतन करना है जिन पर हजारों सालों से ये प्राचीनता नवीनता का मुक़ाबला कर रही है।।।।।।।।

आज फिर अन्ना जग उठे हैं. ग्रीनपीस जैसे एन॰जी॰ओ॰ ने अबकी भूमि अधिग्रहण मुद्दे पर अन्ना को उकसाया है। जिन अन्ना के जरिये जन लोकपाल के मुद्दे पर कभी आवाज़ एन॰जी॰ओ॰ ने आगे कर भारत को भी मिस्त्र, सीरिया, लीबिया आदि की तरह राजनैतिक अस्थिरता में फंसाने की चाल चली थी।
अरे विश्व के सभी समाजसेवी और पर्यावरणीय संस्थाओं जरा भारत की आत्मा में बसे ग्रन्थों को उठा कर देखो, इस भूमि की धुरी “गीता” को पढ़कर देखो फिर बताना तुम्हारे समाजसेवा के छलावे से कितना अलग है हमारा प्रकृति विज्ञान, जो हमारी नसों में खून बनकर बह रहा है।
अगर तुम्हें समाजसेवा करनी ही है तो जाओ आर्कटिक ध्रुवों में तेल खोज रही कंपनियों को रोको जो पृथ्वी कि धुरी को तबाह करने का कुचक्र कर रहे हैं. जाओ जाकर पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की सुधि लो जहां जनता जुल्म और भूख से बेहाल है, जाओ चीन द्वारा पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में चल रही हिमालय खोदने वाली परियोजनाओं को रोको वरना भारत को तबाह करने की मंशा में मानवता को ही खो बैठोगे, आई॰एस॰आई॰एस॰ को फंड देने वाले अरब देशों को समझाओ और अमेरिका को उन्हें हथियार बेचने से मना करो…………
अरे काहे एक शांत, सभ्य और मानवता रक्षक मुल्क को अस्थिर करने की साजिश रचते हो???????
यहाँ के 18 करोड़ सूफीपंथी और 107 करोड़ शैव, वैष्णव, जैन, बौद्ध, सिक्ख, अद्वैतवादी, साधु और ईसाइयों से बना सनातन भारत उन विदेशी सलाहों का मोहताज नहीं है जिन देशों में कैथोलिक-प्रोटेस्टेंटो, शिया-सुन्नियों, महायानियों-हीनयानियों के मध्य वैमनस्य की चरमता है।

मोदी की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उमर, राहुल, अखिलेश और ओवैसी जैसे दृढ़ भारतीय कंधा जोड़े खड़े हैं। ये वो भारतीय हैं जो इतनी विषमताओं में भी डिगे नहीं हैं। उमर अलगाववादियों से घिरे होने के बावजूद खुद को कश्मीरी पंडितों का वंशज कहते हैं और कश्मीर की भव्यता को पुनर्जागृत करने का स्वप्न लिए हैं, राहुल गरीबों की कुटिया में खाना खा कर भरपूर नींद सो जाते हैं उनके साथ गावों की धूल फाँकने और पसीना बहाने में आनंद का अनुभव करते हैं, अखिलेश खामोशी से उत्तर प्रदेश की सभी सड़कों में साइकिल लेन और वृक्षों को लगाये चले जा रहे हैं, तो ओवैसी धर्मान्धों के बीच खड़े होकर आने वाली मुसलमान पीढ़ी को साक्षर कर रहे हैं और सीमित जनसंख्या नीति की पुरजोर वकालत कर रहे हैं।

ये भारत की संतानों की वो अग्रिम पंक्ति है जिन्हें हालात और प्रलोभनों के थपेड़े कभी मीर जाफ़र, जयचंद या विभीषण नहीं बना सकते।
इनके भीतर वो भारत बसता है जो हजारों सालों से अजेय है, ये भारत विज्ञान है, ये भारत अध्यात्म है।
ये भारत मानवता का स्वर्णिम अध्याय है………
ये भारत गीता के एक एक अंश से सराबोर है जो सिर्फ मानवता को जानता है वो शिया – सुन्नी को नहीं पहचानता, वो शैव – वैष्णव को नहीं जानता, वो ब्राह्मण – शूद्र को भी नहीं मानता।

ये भारत हिमालय है, पीपल है, गंगा है, सिंधु है, तक्षशिला है, नालंदा है। निगमानन्द का प्राण है जिन्होने तब गंगा की अविरल धारा के लिए भूख और प्यास से देह त्यागे थे, जब विदेशी मीडिया और विदेशी चंदा अन्ना की जय जयकार में लगा था।
लेकिन हे निगमानंद तुम्हारा भारत अभी जीवित है. टाइम्स आफ इंडिया के कोने में छपी तुम्हारी मौत की खबर के रूप में वो आत्मा हम सवा अरब भारतीयों के हृदय में प्रज्ज्वलित है।

भारत को तोड़ने की कोशिश करने वालों इस बात को अच्छी तरह समझ लो, भारत से उपजे सुवाक्यों की दम पर हमें अस्थिर करने का सपना मत देखो। भूमि अधिग्रहण के लिए तुम्हारे मीडिया से ज्यादा मुखर सरकारी तंत्र की खुली वेबसाइट है जिसमें बिना धरना दिये भारत का एक एक नागरिक अपनी चिंताओं और सुझावों का वर्णन कर सकता है।

इसी प्रकार भारत को विदेशी दुष्प्रचारों के पर्दे के पीछे का षड्यंत्र समझना होगा। ठहर कर सोंचना होगा कि उत्तेजित करने वाली उत्कृष्ट शराब के द्वारा मौतों का आंकड़ा कई गुना अधिक है बनिस्बत निकृष्ट भारतीय भांग के द्वारा शांत नशे में मस्त रहने वाले लोगों से। विदेशी तकनीकी से बने गुट्खा खा कर रात में सो जाने वालों के मुंह में तेज़ाब की तरह भीतरी त्वचा को आघात कर कैंसर से मरने वालों को पढ़ना होगा भारतीय पान के कृमिनाशक तथा एंटी एलेर्जिक गुणों को।
क्या ये संभव हो पाएगा वैश्विक व्यावसायिक युग की पिपासा के मध्य? जहां भारत के प्रकृति विज्ञान पर पश्चिमी भौतिक विज्ञान की श्रेष्ठता को सिद्ध करना ही मकसद हो…….
भले ही आज वही पाश्चात्य विज्ञान “कैनाबिस सैटाइवा” या “भांग” के एंटी ऑक्सीडेंट तथा कैंसर रोधी गुणों पर शोध कर रहा है। आज हमारे पारंपरिक गुड़ को क्यों प्रमुखता दे रहे हो कार्बोनेट शर्करा के दुष्परिणाम से ग्रस्त डाइबिटीज़ मरीजों के ऊपर??????

कैसा आश्चर्य है कि जब पाश्चात्य विज्ञान अपने आविष्कारों के दुष्प्रभावों के जाल में फंस जाता है तब वो भारतीय सनातन विज्ञान के ग्रन्थों के तथ्यों पर शोध करना शुरु कर देता है इन दुष्प्रभावों से निजात पाने के लिए…….

माँ के द्वारा भूमि आंवले से पीलिया का इलाज या नज़र लगने पर सरसों के तेल से भीगी बाती को जलाकर बुखार को ठीक करना, चोट के दागों को घमरे की पत्ती घिस कर ठीक करना. हर बीमारी का पहला इलाज करने वाली माँ का वो स्वरूप क्या वर्तमान पीढ़ी से आगे जा पाएगा? जो स्त्री आज़ादी के नाम पर माँ और बच्चों को दूर करती जा रही है……..
पुरुषों और वंशों को उत्पन्न करती – पालती – सहेजती ये शक्ति, त्याग और करुणा की मूर्ति क्या धरती माँ का रूप धर पाएगी?????? पर्यावरणीय चक्र में परिवर्तन होने से भयावह दुष्परिणाम, नए विषाणुओं के जरिये विभिन्न महामारियों का जन्म, कड़ी गर्मी और अचानक वर्षा, भूजल की नाजुक स्थिति, रसायनिक और प्रसंस्करित विदेशी अन्न और सब्जियाँ।
साथ ही साथ उस पर बेलगाम जनसंख्या का भविष्य……………
समीप खड़ी बहुत ही विषम परिस्थितियों में क्या माँ हमें बचा पाएगी??????
क्या वो टैनरियों से निकले क्रोमियम वाले पानी से सींचे अनाज और ओक्सिटो्सिन इंजेक्शन से बढ़ी लौकी की बजाय घर में उगी भिंडी, बैंगन, सेम, पपीता, तरोई के बल पर हमें पुष्ट कर पाएगी???? भारत को कभी भूखा न रहने देने वाली गृह बगिया संस्कृति फिर लौटेगी????? क्या वो संस्कृति फिर वापस आएगी जिसमें क्यांरी भी जमीन के पानी को भीतर रोकती थी।

कंक्रीट के साम्राज्य पर खड़ा एम्स क्या जंगलों में स्थित सुश्रुत के तक्षशिला का स्थान कभी ले पाएगा???? जहां कभी चिकित्सा सेवा थी, निरंतर खोज थी, समर्पण थी, त्याग थी…………
वो क्या अब व्यवसाय की संकीर्णता और कुटिलता के दुष्चक्र से बाहर निकल पाएगा????

क्या हमारी माँ भारत की सर्वाचीन शिक्षा से हमें प्रकृति के करीब ला पाएगी?????
क्या वो भारत को उसके अपने चिरंजीवी संस्कार दे पाएगी जहां से हम सारे संसार के जीवों को इन विषम परिस्थितियों से बचाने निकलेंगे।।।।।।।।।।।।।।।
वन क्रांति – जन क्रांति

राम सिंह यादव (कानपुर, भारत)
yadav.rsingh@gmail.com
www.theforestrevolution.blogspot.com

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