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भारत - 1

Posted On: 25 Jul, 2014 Others में

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भारत

आज जब सारी मानवता पर विश्व युद्ध का खतरा मंडरा रहा है तब चिर युवा भारत एक नए जोश के साथ अंगड़ाई ले रहा है। शताब्दियों की परतंत्रता के बाद एक साधु ने राजनीति की कमान संभाली है।

अद्भुत ब्रह्मांड की सजीव संरचना पृथ्वी के ठीक मध्य में स्थित भारत की पारलौकिकता को सिद्ध करना शायद शब्दों और यथार्थ के सामर्थ्य से भी परे है. भारत उद्गम है विश्व का और जीवों का पोषक भी। मानवता को स्थिर – शांत रखने वाली गंग सिंचित धरा कभी इतनी विरल नहीं हो पायी जितनी वर्तमान में इसकी हालत इसी के बुद्धिमान, व्यावसायिक और महत्वाकांक्षी संतान ने कर दी।

भारत……. मेरी कल्पनाओं और आधार का संसार साथ ही उस अद्भुत चरम वैज्ञानिक संस्कृति का वाहक जो संसार की समस्त सभ्यताओं के लिए स्वप्न मात्र है। अरबों को गिनती सिखाता, यूरोप का पुनर्जागरण करता और पूर्वी विश्व को अध्यात्म की शिक्षा देता ये भारत हजारों सालों से अक्षुण्ण संस्कृति की अलख जगा रहा है।

इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि हजारों वर्षों से परखी शिक्षा आज की मात्र तीन शताब्दियों पहले बनी शिक्षा पद्धति को विकास का संवाहक समझ रही है। कितनी तेज़ी से पनपा विश्व कितनी तेज़ी से नर्क के गर्त की ओर बढ़ चला? कौन था इस पटकथा का लेखक?

जंगलों में बैठा मेरा भारत कितना अलग है इस नश्वर विश्व से !!!! हे कृष्ण, कितनी सत्य है तुम्हारी गीता वर्तमान के संदर्भ में. अर्जुन की शंका के समाधान हेतु दिखाया गया ब्रहमस्वरूप उस पुरा इतिहास से वर्तमान तक बिल्कुल वैसा ही है. उस वक्त जिस प्रकार कौरवों के कटे छंटे, रक्त से सने शव तुम्हारे बाएँ मुख से अंदर जा रहे थे और दाहिने मुख से पांडव व अन्य विद्वान मनीषि जन्म ले रहे थे. क्या इसी प्रकार वर्तमान की परिस्थितियाँ भी सात अरब मनुष्यों को अपने लपेटे में ले चुकी हैं? विश्व के लगभग सभी देश दो खेमों मे बंट चुके हैं, एक ओर मानव है और दूसरी ओर राक्षस !!!!!

धर्म, सत्ता और व्यवसाय की लालसा लिए ये मूर्ख जातियाँ सरेआम गर्दनों को काटती, उनसे फुटबाल खेलती, सिरों को गोलियों से उड़ाती, ड्रोन के विस्फोटों से धूसरित बच्चों – समुद्र तट पर खेलते नौनिहालों के रॉकेट से छलनी शवों को देख अट्टहास करती राक्षसी मानसिकता उन मनुष्यों पर हावी हो रही है जहाँ स्त्री आँचल में अपने दुधमुहें बच्चे को समेटे दुलार रही है या वो हीन पिता जो सुबह से शाम हाड़तोड़ मेहनत करके कमाए पैसे से कुछ फल, मिठाई लेकर घर की ओर दौड़ता है, अपने बच्चे और पत्नी के चेहरे को मुस्कुराहट से भरने।

सत्य है, हे विश्वरूप, आज भी मानव तुम्हारी वेदी मे प्राण दे रहा है और दूसरी तरफ उसका जन्म हो रहा है. इतिहास कभी नहीं बदला।।।।।।

कोलोसियम में भूखे शेरों का ग्रास बनते मानव के विक्षत अंगों को देख उल्लास से ताली बजाता रोमन साम्राज्य, सोने के अथाह भंडारों का दंभ भरती इंका सभ्यता, विशाल त्रिकोणों में ऊर्जा के सिद्धान्त को खोजता मिस्त्र या दुनिया को बारूद और किताब की शक्ति से परिचित कराती चीन की कहानी। कितनी दूर तक इनकी यात्रा चली? हजारों सालों के इतिहास में कोई भी सभ्यता अपनी पाँच पीढ़ियाँ भी नहीं बढ़ा पायी। कभी प्रकृति की निर्ममता ने तो कभी मानव के अपने कट्टर दंशों ने इनके अस्तित्व को मिटा दिया। कैसा इतिहास और कैसा भविष्य था उनका? इसे लिखने में समाज के ठेकेदारों की कलम जरा भी नहीं कांपी?

हे कृष्ण तुम्हारा युग तो अनंत युगों का विज्ञान था, हम हिग्स बोसॉन में उलझे हैं परंतु तुम तो प्राण और आत्मा तक पहुँच गए थे। ब्रह्मांड और सृष्टि की व्याख्या करने वाले हे परम पूज्य, हमारा विज्ञान बहुत बौना है अभी। लेकिन तुम्हारे चरम विज्ञान को भी तो मानवीय लालसा ने नहीं बख्शा था। धर्म और अधर्म के युद्ध में किसकी विजय हुई थी? इतिहासकार क्यों शांत हैं?

“महाभारत” का “भारत” जंगलों में छिप गया और गगनचुंबी चट्टानें रेत में बदल गईं। वही मानव जिसकी वृत्ति राक्षसी थी, मानवता की दुहाई देता जंगलों की ओर भागा और अस्त्र छोड़ उपदेशों की कहानियाँ लिखने लगा।

शनैः शनैः विकास की सीढ़ियाँ चढ़ता विश्व पुनः उसी ऊंचाई पर पहुँच चुका है जहां से उसके पुरखे ज़मींदोज़ हुये थे। सिर्फ भारत ही इसका अपवाद है. हजारों सालों से संस्कृति समेटता मानव विध्वंस को झेलता, फिर वही बरगद और पीपल की छांव में गंगा का पानी पिलाकर मानव को प्राण देता ये भारत कभी खत्म नहीं हो पाया।

कौरवों-पांडवों का महाभारत, शैव-वैष्णवों का संग्राम, कलिंग की लाशें…. यवन, शक, कुषाण, हूण, मंगोल, सीथियन, अरबियों की कटारें…. सब यहाँ अपनी संस्कृति और धर्म फैलाने आए लेकिन इसके उलट भारत ने इन्हें ही कालचक्र के पाश में जकड़ कर आत्मसात कर लिया. इनकी अपनी संस्कृति कहाँ विलुप्त हो गयी और कब ये भारतीय हो गए पेड़ों के नीचे ध्यान लगाने वाले. इसकी व्याख्या करना आज नामुमकिन है।

हे भारत तेरी प्रासंगिकता हजारों वर्षों बाद भी जस की तस है, आज भी तेरे विचार और तेरे सूक्ष्म विज्ञान की विश्व को आवश्यकता है. तेरा अध्यात्म आज भी विश्व के मानवों की आत्म संतुष्टि का चरम लक्ष्य है। हे भारत, सिंधु से लेकर ब्रह्मपुत्र तक फैले तेरे दो अरब वंशज शायद अपने इतिहास को पहचान सकें और बचा लें कुछ जीवों को निकट महाप्रलय से।

l हमारी संस्कृति मालों और व्यवसाय की नहीं है। हमारे प्रत्येक कर्म में प्रकृति और समाजिकता का सम्मान रहता था, हम उतना ही कमाते और संचय करते थे जितने में हमारे परिवार, अतिथि और साधुओं का पोषण हो सके बाकी समय हम अध्ययन, चिंतन, सामाजिक कार्यों आदि के लिए रखते थे।

आज की अतिवादी संस्कृति से जितनी जल्दी दूर हो जाएँ उतना ही अच्छा है वरना जिन चरम स्थितियों की दस्तक भारत के द्वार पर है उसके बाद भारतीय सिर्फ प्रारब्ध को ही कोस रहे होंगे। प्लास्टिक, डिब्बा बंद खाद्य व पेय पदार्थ, एयर कंडीशंड वातावरण, डिटरजेंट, कास्मेटिक्स, पेट्रोल तथा डीजल पर निर्भर जीवन, जहरीली खाद, झूठी वैज्ञानिकता से उत्पन्न विकृत बीज, सपाट छतों वाली अट्टालिकाएँ, सुबह से शाम तक फर्श चमकाते कीटनाशक और उसके बाद जहरीली गैसों, गंदगी से बजबजाते नाले…….. हमारी पराकाष्ठा का इम्तिहान ले रहे हैं।

l सात अरब मनुष्य सीधे सीधे काल का ग्रास बनता दिख रहा है, छद्म ऊर्जा पर जीता हमारा जीवन वास्तव में अकाल मृत्यु की ओर भागते कदम हैं। इराक युद्ध और कोयले की कमी, अधिकतर भारतीयों को गर्मी और वाहनों की चिंता में डुबोए हुए है लेकिन मुझे पीने के पानी के लिए तड़पते, लड़ते और मरते हुये लोग दिख रहे हैं. घर से कुछ दूर सरकारी हैंडपंप था वो भी सूख चुका है. क्या होगा जिस दिन बिजली नहीं आएगी? चाहे सरकारी नलकूप हों चाहे घरों की मोटरें…… कैसे बुझाएंगे मेरे सिंधुस्थान के दो अरब सूखे कंठ?

जवाब सिर्फ इतना है की तोड़ दूँ सीमेंट, कंक्रीट और डामर की परतों को और पेड़ लगा दूँ, गड्ढे करके तालाब बना दूँ ताकि जमीन पर पानी ठहर सके और सूखी धरती को बरसता पानी फिर गहराई तक सींच दे।

l हर तरफ स्त्री अस्मिता की चीख पुकार मची हुई है, आखिर हमारी संस्कृति का भी वही हाल हो रहा है जिसकी आदी पश्चिमी सभ्यता है। बारह वर्ष की आयु तक कौमार्य भंग कर देने वाली संस्कृति अंततः हमारे परिवेश को तोड़ देने में सफल होने लगी है. हमारी कन्या, हमारी माँ, हमारी बहन आज के युग में स्त्री क्यों हो गयी?

सांस्कृतिक प्रदूषण का इससे बड़ा आघात क्या होगा कि पिता, भाई और बेटे का रिश्ता तक कलंकित हो चुका तो बाहरी रिश्तों का विश्वास कहाँ बचा?

स्त्री आजादी के लिए चिल्लाने वाली विदेशी मंच पर आसीन संस्थाएं, धीरे-धीरे हमारी पारिवारिक व्यवस्था को ध्वस्त कर चुकी हैं. वास्तव में भारत की पारिवारिक व्यवस्था वो थी जिसमे स्त्री परिवार का केंद्र होती थी। पुरुष कमाता था जिसे स्त्री को देता था और स्त्री उस मुद्रा से पुरुष, बच्चों तथा वृद्धों का पालन-पोषण करती थी। स्त्री को बाहरी कार्यों से बचाया जाता था क्योंकि स्त्री परिवार का गौरव थी। स्त्री के सम्मान का ही परिणाम रामायण व महाभारत हैं।

स्त्री को बाहर दिखने वाली वस्तु बना कर चाहे वो फिल्मों, रियलिटी शो, विज्ञापनों, चीयरगर्ल, पब-बार आदि में उभार कर वास्तव में उसका चारित्रिक हनन कर रहे हो। जिस कन्या को जन्म से तुतलाती आवाज में पिता खिलाता हो, जिसे गले लगा कर अपना वात्सल्य प्रकट करता हो. उसी की फिल्म को देखते हजारों लोगों के भद्दे व अश्लील शब्दों को सुनकर क्या उसका कलेजा नहीं फटता? ऐसा तो नहीं था भारत।

पुलिस, डिफेंस आदि में स्त्रियों को नौकरी देकर किसका फायदा हो रहा है? कुछ दिनों पहले उड़ीसा की हिंसा में एक महिला पुलिसकर्मी के वस्त्र फाड़ दिये गए, आए दिन यौन उत्पीड़न से ग्रस्त महिलाएं अपना विरोध दर्ज करा रही हैं।

हे माँ, हे बहन, हे देवी वास्तव में तुम्हें आजादी के नाम पर छला जा रहा है. पुरुष अपनी मनः संतुष्टि के लिए तुम्हें पैसे देकर बाहर निकाल रहा है. तुम्हें तात्कालिक धन और सुविधाएं तो दिख रही हैं, लेकिन अनजाने में तुम ऐसा अपराध कर रही हो जिसके लिए तुम्हें भारत का भविष्य कभी नहीं क्षमा करेगा।

तुम्हारी औलाद की संवेदनहीनता, उसके ड्रग्स की हर कश, उसके गंदे चरित्र पर उठती उंगली, किसी के जेब काटते हाथ, किसी के घर में चोरी करते, किसी को ठगते, अवसाद में फंसे आत्महत्या करते इंसान की शिक्षक तुम ही थीं।

भारतीय विज्ञान प्रकृति का प्रतिरूप है. प्रकृति की सारी व्यवस्था में हर जगह दो आवेश हैं एक ऋणात्मक और दूसरा धनात्मक. दोनों कभी एकात्म नहीं हो सकते लेकिन सदैव एक दूसरे की तरफ आकर्षित होकर सृष्टि को चलायमान रखते हैं। सूर्य व पृथ्वी फिर दक्षिण व उत्तरी ध्रुव एक पुरुष और स्त्री की भांति जुगलबंदी करते हुए पृथ्वी में प्रजातियों को जीवन दे रहे हैं। पृथ्वी में भी उत्तरी ध्रुव एक स्त्री की भांति अपनी संतानों के घनत्व के प्रति उत्तरदायी है।

इसी प्रकार वृहद से लेकर सूक्ष्म जीव को देखने में पता चलता है की पुरुष चाह कर भी वो व्यवस्था उत्पन्न नहीं कर सकता जहां वो अपनी औलाद का शिक्षक अथवा पोषक बन सके और न ही संतान का अपने पिता से वो भावनात्मक रिश्ता बन सकता है जिससे वो माँ के गर्भ में आने से लेकर मृत्यु पर्यंत जुड़ा रहता है।

सच कितनी विलक्षण है माँ, शरीरों के दोलन के पश्चात एकत्रित शुक्र और डिंब की ऊर्जा को अपने गर्भ समेटकर उस प्राण को मांस और मेद का जामा पहनाती नौ महीने तक अपने रक्त से सींचती है।

हे माँ, ले चलो हमें उस गौरवमयी इतिहास के पास जहां यशोदा नन्दन कृष्ण ने आध्यात्मिक विज्ञान संसार को दिया था, हमें महाभारत काल के उस हिस्से पर छोड़ दो जहां हम फिर से अन्वेषण में लग जाएँ कि मनुष्य के जीवन का लक्ष्य क्या है।

l ऐसा भी नहीं की स्त्री को चारदीवारी में कैद कर उसका शोषण करो बल्कि उसका अपने अस्तित्व के लिए महत्व समझो। सारी सृष्टि का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सिर्फ स्त्री ही है। स्त्रियों को उनकी गरिमानुकूल रोजगार मे अवसर दिये जाएँ, जैसे कि शिक्षा, साहित्य, सामाजिक शोध आदि सुरक्षित दफ्तरों वाली नौकरियाँ. लेकिन स्त्रियों को अपने विवेक से यह तय करना होगा कि खुले में पुरुष कि चक्षु वासना को तृप्त करने कि अपेक्षा उस संतान के लिए अधिक जिम्मेदार है जिसकी वो भगवान है।

संतानोत्पत्ति के पश्चात स्त्री अपनी संतान को ही अपना भविष्य समझे और जिस प्रकार सृष्टि में स्थित प्रत्येक जीव की माँ अपनी औलाद को जिंदगी जीने की कला में प्रवीण करती है उसी प्रकार अपने कर्तव्य का निर्वहन करे। बैंगलोर जैसे कारपोरेट शहरों में आत्महत्या करने की बजाय अपने बच्चों को दुलरायेँ।

हे माँओं, संचार करो करुणा, नैतिकता, प्रेम और ममता का कठोर पुरुषों में-पीढ़ियों में। बचा लो मृत होते विश्व से भारत को। छोड़ दो अपनी नौकरियों का मोह और बचा लो अपनी संतानों को।

तुम स्वयं ध्वस्त कर दो उस संस्कृति को जो भारत की माँ, बेटी और बहन को स्त्री बना रही है। तिरस्कार करो उस नवीन अश्लीलता का जिसे तुम्हारा बच्चा अपना आदर्श समझ रहा है. फिल्मों-नाटकों-विज्ञापनों का वासनामय प्रदर्शन उन अभिनेताओं और अभिनेत्रियों का तो कुछ नहीं बिगाड़ रहा लेकिन कामाग्नि का मदांध अनुसरण करते तुम्हारे पुत्र तथा पुत्रियाँ अपना व अपने परिवार के भविष्य की हत्या कर रहे हैं।

स्त्री और पुरुष के मध्य आकर्षण प्रकृति प्रदत्त गुण है यदि इनका एकांत सामीप्य हुआ तो निश्चित ही अश्लीलता के श्रेणी में आएगा। हमारे ग्रन्थों के आधार पर परस्पर दृष्टि डालना भी संभोग माना जाता था जो मन को विचलित करता है और कर्तव्य पथ से डिगा देता है।

माँ, सामाजिक मूल्य और मर्यादाओं को पुनः उस स्तर पर स्थापित कर दो जहां हम मातृ, बहन, पुत्री व पत्नी के मध्य भेद कर सकें।

l हे माँ, आने वाले भविष्य में भारत एक गंभीर संकट की ओर अग्रसर है। कलम और कम्प्यूटर को विराम देकर घरों में क्यारियाँ बना दो जो तुम्हारे परिवार का पेट भर सके, पेड़ लगा कर जमीन में पानी भर दो, पीढ़ियों के ज्ञान विज्ञान और पारंपरिक औषधियों को आने वाली पीढ़ियों के लिए संकलित कर दो जिससे तेरी सन्तानें अल्प आयु में कैंसर, हृदयाघात, मधुमेह आदि का ग्रास न बन जाएँ।

हे माँ, अपने परिवार को सुबह जवारे का आहार दो जो उसको कैंसर जैसे रोग से बचा ले, हे माँ तुलसी का पत्ता खाली पेट खिलाओ ताकि वो कभी वायरस जनित रोगों से न मरे (बहुत संभव है की एड्स तक का वायरस भी तुलसी खत्म कर सकती है), केलाग्स-बोर्नविटा-हॉर्लिक्स-कंपलान आदि रसायनिक नाश्ते को फेंक कर प्राकृतिक दलिया का आहार दो जिससे तुम्हारा बच्चा जवान होते ही हृदयाघात का शिकार न हो जाये. जिस हल्दी, नीम, अशोक, अश्वगंधा, घृतकुमारी, भूमि आंवला आदि को अमेरिका पेटेंट कराता घूम रहा है उसे तुम अपनी पीढ़ियों के विज्ञान में लिख दो और योगदान दो भारतीय संस्कृति के संकलित कोश में।

हे माँओं भारत की ऊर्जा आवश्यकता को न्यून कराओ और बिजली की खपत करने वाले उपकरणों का उपयोग कम से कमतर करती जाओ. स्वेच्छा से बिजली कटौती का समय निर्धारित कर दो।

l हमारा भारत भौतिक ऊर्जा का गुलाम हो चुका है. हर क्षण इसी ऊर्जा के सहारे हमारा आधार जीवित है. खाड़ी देशों पर आघात होते ही अपना देश महंगाई के भंवर में घिर जाता है। हर वस्तु के लिए हम ट्रांसपोर्ट पर निर्भर हैं. अब वक्त आ गया है की हमें अपनी साइकिलें निकाल लेनी चाहिए और पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करके बहुमूल्य तेल बचाना होगा, अन्यथा कोयले के अभाव और तेल की कमी से उत्पन्न होने वाले संकट का सामना करने के लिए भारत तैयार नहीं है।

l हे नीति निर्धारकों, मीडिया पर सेंसर लगाना मानवता के लिए अपरिहार्य हो चुका है. समाज के लिए ये अब विध्वंसक बन चुके हैं. रेटिंग और व्यवसाय बढ़ाने की लालसा में ये नैतिक – अनैतिक सभी तरह के विचारों का प्रसारण कर रहे हैं जिसका प्रसारण अत्यंत ही गंभीर है. स्वामी निगमानन्द की मृत्यु पर ये मीडिया शांत था लेकिन अन्ना का अनशन फिल्मा रहा था क्योंकि वहाँ उसे विदेशी फंडों से हिस्सा मिल रहा था। वो यहाँ भी उन्हीं परिस्थितियों को पनपा रहा था जिसका परिणाम मिस्त्र, सीरिया या यूक्रेन के वासी भुगत रहे हैं। साईं-शंकराचार्य विवाद को सुबह से शाम तक नमक मिर्च लगाकर सुनाने वाले लोग भारतीय समाज को विभाजित कर रहे हैं. चाहे वैदिक-हाफ़िज़ मुलाक़ात को तूल देना हो अथवा भारत-चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश के बीच छोटे से विवाद को भी ऐसा मुद्दा बना देते हैं जिसकी परिणति संग्राम तक पहुँच सकती है, मलेशिया का विमान भले ही तकनीकी खराबी से ध्वस्त हुआ हो अथवा भूलवश मिसाइल का हमला हो लेकिन आज रूस व अमेरिका विश्वयुद्ध की तैयारी में जुटे हैं तो सिर्फ मीडिया के व्यर्थ वाद की वजह से, रोटी के टुकड़े में भी खबर ढूंढ कर धर्म से जोड़ने वाले, असम हिंसा की भेंट चढ़े लोगों का धार्मिक वर्गीकरण करने वाले, मुजफ्फर नगर – मुरादाबाद में झूठी सच्ची कहानियाँ लिखने वाले संवेदनहीन मनुष्य नहीं जानते की इनके मुख से निकले वाक्य का परिणाम क्या होगा, कैसा होगा, किसके हित में होगा? वास्तव में ये सोचना इन क्षुद्र बुद्धि मानवों की मति से परे है।।।। ये मीडिया, कथित एन॰जी॰ओ’ज़ व वैश्विक लालची कंपनियों की आँख, कान व जिह्वा हैं, जिन्हें क्या बोलना है, क्या दिखाना है ये ऐसे समूह तय करते हैं जिनके भीतर भारत की संस्कृति को खत्म करके अपना व्यवसाय स्थापित करने की ललक है। इस मीडिया के चक्रव्युह को तोड़ना बहुत सरल है, प्रत्येक स्तर के विद्यालय से कम से कम दो मेधावी छात्रों का चयन कर जिले स्तर के समूह बनाएँ जाएँ जिनका उपयोग सरकार व जनता के मध्य सीधा संवाद स्थापित करने में किया जाये।

l सारा विश्व इसी युवा शक्ति को केन्द्रित कर अपनी नीतियाँ बना रहा है, क्योंकि ये बहुत सरल और आज्ञाकारी होता है इन युवा समूहों को जरा सी दिशा दिखा कर उनकी ऊर्जा को अपने मुताबिक इस्तेमाल किया जा सकता है। आई॰एस॰आई॰एस॰, मुजाहिदीन, लश्कर, बोको हरम अथवा साधु गांधी को मारने वालों जैसे असंख्य नौजवान गलत दिशा की ओर भटक कर मानवता के विरुद्ध हो गए। लेकिन भारत को अपनी युवाशक्ति का प्रोत्साहन, चिर-नवीन भारतीय संस्कृति के संरक्षण तथा विश्वयुद्ध की परिस्थितियों के मध्य मानवता को नए युग में ले जाने के लिए करना होगा।

l हमें अपने परिवारों, समाजों, गावों, पीढ़ियों, परिचितों के मध्य प्रचलित ज्ञान-विज्ञान, औषधियों, तंत्र-मंत्र (मनोवैज्ञानिक निदान), पौराणिक रीतियों, कर्म कांडों का संकलन करके उनका भारतीय वैज्ञानिक तर्कों व तथ्यों से शोधन कर भारतीय संस्कृति का महाकोश तैयार करना होगा। भारत के एकांत जंगलों में नालंदा व तक्षशिला जैसे वैदिक शोध विश्वविद्यालय स्थापित करने होंगे जो धार्मिक रूढ़ियों से विरत होकर उस प्राचीन भारतीय आविष्कारों और आयुर्वेदीय शोधों से विश्व का परिचय कराएंगे जो समय और बाह्य सांस्कृतिक आक्रमणों के कारण लुप्तप्राय हो गए थे।

…….. जारी है

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