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सिंधुस्थान - 2

Posted On: 6 Jun, 2014 Others में

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….. मानवता के इन कठिन दुर्दिनों में हज़रत मोहम्मद ने प्रेम, वात्सल्य और भावनाओं का संचार किया. उन्होने मानव को फिर से आध्यात्मिक उन्नति पर ले जाने का प्रयत्न किया जहाँ प्राकृतिक अवस्था की वकालत थी, जहाँ भिन्न भिन्न मंदिरों, देवताओं, कर्मकांडों, व्यवसाय, अंध उपभोग और अमानवता का विरोध था। उन्होने अपना सारा जीवन मानवता को समर्पित कर दिया। लेकिन हर सच्ची बात कड़वी ही होती है, इससे पुरोहित व सत्ता वर्ग को अपने व्यवसाय पर संकट नज़र आने लगा और वो इनके तथा परिवार की जान के दुश्मन हो गए। अध्यात्म के एक सच्चे साधक ने फिर से शिव की परंपरा को पुनर्जीवित किया था. उसने प्रकृति के विरुद्ध आडंबरों को खारिज कर दिया, उसने संगीत, कला, मानव एकता और प्राकृतिक जीवन को परिभाषित किया।

कालांतर में जिस तरह से शिक्षित मानवों अर्थात पुरोहितों ने सनातन धर्म को अपने कलेवरों से बदला ठीक उसी तरह इस्लाम की खलीफाओं और मौलवियों द्वारा व्याख्याओं ने धर्म के मूल स्वरूप को नष्ट कर दिया। अब इस्लाम का अर्थ सत्ता में बदल चुका था. जितने अनुयायी होते उतनी ही खलीफा की शक्ति बढ़ती, इसके लिए उन्होनें किसी भी सहारे को गलत नहीं माना। अध्यात्म फिर से भोग तरफ मुड़ गया था।

धर्म प्रसार के नाम पर सत्ता प्रसार के लिए भारतीय उपमहाद्वीप से निकला मानव फिर यहाँ पर लौटा लेकिन अब वो हथियारों के बल पर आया था, एक नवीन और कट्टर संस्कृति को लिए। कैसी विडम्बना थी हजारों साल बाद वो अपनी ही पीढ़ियों को रौंदना चाह रहा था।

भारत पर आक्रमण हुआ। गाँव-शहर तबाह हुये, यहाँ का भोला मानव मारा जाता रहा। जीवन, अस्मिता और बच्चों को बचाने के लिए असंख्य परिवारों ने धर्म परिवर्तन कर लिए, जो इसमे नाकाम रहे उन्हे काफिर कह कर कत्लेआम कर डाला जाता था।

मूर्ख कट्टर मानवों ने अपने ही वंशजों के गले काटे थे।

लेकिन इस कट्टर आक्रमण का दूसरा पहलू भी था। सदियों से असंगठित भारतीय समाज संगठित होने लगा। हजारों संप्रदायों व धर्मों मे बंटा मानव एक हो चला। शैव और वैष्णव संप्रदाय में बंटे एक दूसरे के धुर विरोधी भी एक हो गए थे। चारों दिशाओं में शंकराचार्य घूम घूम कर एक संस्कृति की अलख जगा रहे थे।

पश्चिमी देशों की एक और दिक्कत थी, जैसे यूनानी सिंधु का उच्चारण “इण्डस” और अरबी “फिंधु या हिन्दू” करते थे। इसी वजह से यहाँ के निवासियों को एक नया नाम मिला, एक नयी भाषा “हिन्दी” मिली और सकल सिंध से लेकर सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के सभी मानवों के विभिन्न धर्मों का विलय हुआ “हिन्दू” नाम में, यानि अब एक बिलकुल नया धर्म अस्तित्व में आ चुका था।

सभी संप्रदायों की मूल धारणा, शिव के विज्ञान, विष्णु की सहिष्णुता और सौम्यता, ब्रह्मा की संहिता, इंद्र के प्रकृति प्रेम, बुद्ध के सम्यक मार्ग, चार्वाक के प्रारब्ध निर्धारण, कृष्ण के अध्यात्म और प्रेम, महावीर की अहिंसा, दुर्गा में नारी सम्मान, पृथ्वी में मातृ प्रेम, पदार्थों का मानवीकरण तथा उसमें आत्मखोज, योग, ध्यान, तंत्र मंत्र – अघोर साधनाएं, इत्यादि “हिन्दुत्व” की विशालता में समाहित हो गईं थी।

इस्लाम आया जरूर अपनी कट्टरता लिए लेकिन जब उसका सामना अपनी जन्मभूमि से हुआ तो वो भी बदल गया. वो मानव जो खून देख कर खुशियाँ मनाता था, अहिंसक होने लगा. जीवों को मार कर खाने वाला खुद ही उनके आंसुओं के साथ भीगने लगा. कृष्ण के “आत्मखोज” को वो “खुदा” कहने लगा, शिव के “नाद” में खो जाने वाले सन्यासियों का नया रूप सूफियों के आत्मविभोर करने वाले संगीत में उभरा. संगीत की स्वरलहरियों के जरिये वातावरण तथा शरीर के अणुओं का दोलन करते हुए अध्यात्म की चरमता प्राप्त करने की विधा सामने आई।

इसको सरल करने के लिए शिव के एक और रूप गुरु नानक ने सिक्ख पंथ को दुनिया के सामने रखा. अति सरल, संगीतमय, प्रकृति प्रेम, समानता तथा सद्भावपूर्ण जीवन की शक्ति से ओत-प्रोत इस पंथ ने इस्लाम को भी हिन्दुत्व में शामिल कर दिया।

हाँ, यह एक शोधपूर्ण सत्य है की भारतीय उपमहाद्वीप में मौजूद सभी धर्मों को यदि अरब आक्रमण के मुताबिक देखा जाये तो यहाँ का प्रत्येक व्यक्ति हिन्दू है और सिंधु नदी के आधार पर पाकिस्तान से हिंदुओं की गणना शुरू होती है। याद करो धर्मों को जन्म संस्कृतियों ने दिया, संस्कृतियों को सभ्यताओं ने और सभ्यताओं को नदियों ने।

इस उपमहाद्वीप का मानव चाहे जिस भी धर्म का हो वो एक ही सभ्यता का प्रतिनिधित्व करता है, वो जन्म से लेकर मृत्यु तक एक ही संस्कृति का वाहक होता है।

भारत में मुगलों का शासन था। सम्राट अशोक की तरह एक और महान शासक अकबर आया जो हिन्दू-मुगल वंश का था. राजपूतों के बीच पला बढ़ा ये महात्मा शुरू से ही जिज्ञासु था, जो संगीत, कला, ज्योतिष और धर्मों में सदा अन्वेषण करता रहा. इस्लाम को हिन्दुत्व के और करीब लाने के लिए इसने मंदिरों के साथ-साथ मस्जिदों की भी नींव रखी।

विशाल हिन्दुत्व में इस्लाम को भी समाहित करने का यह एक अतुलनीय उदाहरण था. महात्मा अकबर ने इसी क्रम में दीन-ए-इलाही में सार धर्म की अवधारणा प्रस्तुत की, परंतु जीवन के अंतिम दिनों में उनके अंदर वो जोश नहीं बचा था. उनकी मृत्यु के बाद सत्ता पर फिर से पुरोहित हावी होने लगे, एक बार फिर सत्ता को खलीफा के अधीन करने का प्रयास हुआ। युवा औरंगजेब के रूप में उनको आसान शिकार मिला, हालांकि अपने पूरे जीवन वो कट्टरता लिए दौड़ता रहा, लेकिन प्रौढ़ावस्था में वो सहिष्णु एवं ग्लानि से भरा था। उसके खत्म होते-होते ये हिन्दू मुगल वंश अपनी पहचान खोने लगा था, धर्म के नाम पर अलगाव पैदा करने वालों ने इस महान साम्राज्य को ढहा दिया था।

पहली बार भारत पर विदेशियों ने कब्जा किया. परंतु ये कब्जा इन्सानों का नहीं व्यवसायियों का था. भारत पराधीन हो गया। अब तक भारत की आत्मा को किसी ने नहीं छुआ था लेकिन अब कृषि, जंगल, गाँव और शिक्षा भी बंधनों में जकड़ गए थे। अब तक पारंपरिक शिक्षा तथा संस्कृति पर किसी ने आघात किया था, पर अब मैकाले की शिक्षा पद्धति थी. भारत की वायु से लेकर जल तक ब्रिटिश उपनिवेश का हिस्सा हो गए थे। नवीन शिक्षा पद्धति ने विशाल भारतीय उपमहाद्वीपीय संस्कृति को तोड़ने का काम शुरू कर दिया तथा भारतियों को भी स्थूलता, भौतिकता, उपभोक्तावादी संस्कृति की ओर खींचने को तत्पर थी।

लेकिन भारतीय संस्कृति वो दाता है जिससे जितना भी ज्ञान ले लो कभी कमी नहीं होती। जिसे पश्चिमी यूरोप अपना पुनर्जागरण कह कर दंभ भरता है, वास्तव में भारतीय जंगलियों द्वारा बांटा गया ज्ञान है जिसे यहाँ के सिद्धांतों का परिष्करण कर दुनिया को दिखाया जाता रहा और आगे भी जाता रहेगा। इन सब बातों से बेखबर भारत के साधु – फकीर निष्काम निश्छल अध्यात्म की अलख जगा रहे हैं।

भारत में दो तरह के वर्ग का उदय होने लगा. एक वो जो पश्चिमी दुनिया को अपना आदर्श मानते थे और दूसरा जो अपनी संस्कृति का कट्टर समर्थन करते थे। व्यवसायियों द्वारा भारत की आत्मा अर्थात शिक्षा पर चोट करने का दीर्घकालीन प्रभाव पड़ा. युवा वर्ग की नज़र में ये पुरानी संस्कृति के बुजुर्ग लोग गवांर और असभ्य से हो गए थे। ये पढ़ा लिखा युवा वर्ग अब भारत की तकदीर था। यूरोप को भारत की शिक्षा ने सब कुछ दे दिया और खुद के लिए रखा वो वर्ग जो अब पश्चिमी मानसिकता का था। वो वर्ग जो अब मोटे कपड़े की जगह पॉलिएस्टर के कपड़े पहनता था। मूर्ख मानव अपना कपास विदेशियों को पहना कर उनका प्लास्टिक पहने इतरा रहा था। व्यावसायिक कृषि के चलते भारत अकालों और भुखमरी से घिर गया।

मानवता और नैतिकता के लिए काला अध्याय लिख दिया था व्यावसायिक विदेशी वणिकों ने।

भारत की आत्मा भले ही पराधीन थी परंतु मरी नहीं। युवा वर्ग भले ही पश्चिमी शिक्षा का अनुकरण करके अपने को सभ्य समझने लगा था लेकिन आखिर था तो यहीं का। एक बार फिर से यहाँ के सभी संप्रदाय और धर्म एक होने लगे थे. युवाओं ने जब अपने ज्ञान की तुलना विदेशी ज्ञान से की तो उन्हे वास्तविकता का पता चला, लाखों संस्कृतियों को जन्म देने वाली इस महान भूमि पर भला गौण और शैशव संस्कृतियाँ, अपना आधिपत्य कैसे स्थापित कर सकती थीं? पश्चिमी विश्व तो गौण और शिशु संस्कृति थी जो सिर्फ उपभोक्ता और अतिवादिता की पर्याय थी।

भारत की पराधीनता अब युवाओं को भी खटकने लगी, पढे लिखे अंग्रेजों की बराबरी का दंभ भरते एक बैरिस्टर युवक के स्वाभिमान को जब अफ्रीका में ठेस लगी तो उसका भारत जाग उठा। उसने अपनी रंगीन कतरनों को उतार फेंका और मोटा खद्दर अपने हाथों से बुन कर पहनने लगा, महलों और चट्टानी इमारतों को छोड़ कर पेड़ की छांव तले बने आश्रम को अपना आशियाना बना लिया। वही पुराने ज्ञान और अहिंसा के व्रत को उठा कर उसने विश्व को अपनी दुबली पतली काया के सामने झुकने पर मजबूर कर दिया।

भारत आज़ादी की दहलीज पर था कि हिन्दुत्व एक बार फिर छला गया धर्म के नाम पर। जाते जाते विदेशी व्यवसायियों के चक्रव्यूह में दो धार्मिक राजनीतिज्ञ फंस गए. सत्ता पाने कि लालसा में इन्होने भारतीय उप महाद्वीप का बंटवारा कर डाला।

कितनी घ्रणित थी ये ये भूख जो लाखों निर्दोषों को काट रही थी, कत्ल हो रहे थे, अस्मत लूटी जा रही थी, बच्चे बिलख रहे थे, इतिहास छूट रहे थे और सभ्यता बिखर रही थी। सिर्फ दो लोगों के नाम पर अपना-अपने को मार रहा था। लेकिन जो इस आज़ादी का मुखिया था वो भूखा प्यासा नोआखली में दंगों के बीच पड़ा था। एक टूटी हुई भविष्य विहीन आज़ादी लेकर भारत और पाकिस्तान अलग हो गए, नफरत भरी अन्तहीन यात्रा के लिए।

आज़ादी तो मिल गयी लेकिन किसी को भी पता नहीं चला कि वास्तविकता क्या थी। झूठी आज़ादी थी ये, सिर्फ निज़ाम ही तो बदला था।

पश्चिमी गुलामी का संचार करती शिक्षा हमारा आधार थी. जिस वजह से जो व्यवसायी जहांगीर के समय में भारत आया और सारे भारत में अपना माल बेचता गया वो व्यवसायी आज भी वहीं मौजूद है। उसने लगभग चार शताब्दियों में लगातार चौगुनी रफ्तार से अपने व्यवसाय व लाभ में वृद्धि की है….. ए॰सी॰, कार, मोबाइल, टी॰वी॰, कोक, साबुन, रेफ्रीजेटर, हवाई जहाज, पुल, बांध, न्यूक्लियर रिएक्टर, सड़कें, क्रिकेट, यूनिवर्सिटीज़, प्लास्टिक, सिंथेटिक, दवाएं, कंप्यूटर, इंटरनेट, बिजली, सीमेंट, जैसी असंख्य चीजें हमारी जिंदगी का हिस्सा हैं। एक ऐसा जीवन जो चौबीसों घंटे हमारी गुलामी को उजागर करता है, आज हम इन सबके बिना जीवन जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते।

क्या इन चीजों के बिना हम जिंदा रह सकते हैं? रोंगटे खड़े हो रहे होंगे जवाब ढूंढने में?? पहले ही झटके में आपका जवाब होगा …. बेहद दक़ियानूसी इंसान है ये…. ये तो हमारी सभ्यता को पीछे ले जा रहा है…….. भला बिना बिजली के भी इंसान रह सकता है?? बिना ट्रान्सपोर्ट के तो जिंदगी थम ही जाएगी…….!!!!!!!!

बहुत सच बात है, लेकिन मैं कुछ जवाब देता हूँ बशर्ते आप व्यवसायी मीडिया और झूठे विदेशी आंकड़ों को भूल कर अपने आस-पड़ोस, अपनी पीढ़ियों की जानकारी करें।

आजादी से पहले तक आपके परिवार में किसको कैंसर था??? दमा था??? कितनी दूर तक आपके पुरखे बिना हाँफे दौड़ लेते थे??? मैंने आंकड़े पढे हैं की आजादी के वक़्त जीवन प्रत्याशा लगभग पचास साल थी और आज लगभग पचहत्तर साल। सरासर झूठे और भ्रामक तथ्यों से भरा पड़ा है विदेशी व्यवसायियों द्वारा लिखा हुआ इतिहास। कैसी विडम्बना है कि आज का आधार ये पश्चिमी देशों के अनुमानित थोपे हुए आंकड़े हैं जो अभी सिर्फ तीन सौ साल पहले जागे हैं और हमारी हजारों सालों पुराने विज्ञान को अंधविश्वास कह रहे हैं। अरे सच्चाई को जरा गौर से देखो तुमने तो तीन शताब्दियों में ही मानवता को खत्म करने की तैयारी कर दी है। कौन सी जगह छोड़ी तुमने अपने व्यवसाय की संतुष्टि के लिए जहां अगली पीढ़ी अपनी जिंदगी बचा पाएगी???

हमारे वास्तविक इतिहास में मानव पूरे सौ वर्ष जीता था, इसके लिए पच्चीस-पच्चीस वर्ष के चार सोपान या आश्रम होते थे। आज अपने सब तरफ नज़र उठा कर देख लो, पचास की उम्र का कोई भी इंसान ऐसा बचा है जिसे गठिया, वात, पित्त, ब्लडप्रेशर, हृदयरोग, डाईबिटीज़, गुर्दे-लिवर के रोग, आँखों के रोग, चश्मा, सुनने की क्षमता, हार्मोनल असंतुलन, बालों के रोग, मानसिक रोग तथा यौन रोग आदि न हों???

कितनी चतुराई से आयुर्वेद की हत्या हो गयी और हमें पता भी नहीं चला। यहाँ का नाड़ी विज्ञान, जिह्वा जांच, स्पर्श चिकित्सा, अंगुली के पोर – आँखों को देख कर – हथेली से शरीर के हिस्सों को छू कर रोग की पहचान करने का विज्ञान कब और कहाँ विलुप्त हो गया, कोई नहीं जान पाया। मानव अंग प्रत्यारोपण और सबसे महत्वपूर्ण मस्तक प्रत्यारोपण की एकमात्र विधा जो पाश्चात्य चिकित्सा के लिए सपना ही है, ऐसा आयुर्वेद कब “नीम हकीम खतरा ए जान” के भूमिका में पहुँच गया या व्यवसायियों ने पहुंचा दिया…………

हमारी संस्कृति में वैद्यकी व्यवसाय नहीं बल्कि सेवा थी जिसे बड़े परिश्रम और कड़े शोध से किया जाता था परंतु आज की संस्कृति में “डाक्टरी” सबसे अधिक मुनाफा देने वाला व्यवसाय॥॥॥॥

…………..आगे जारी है…….

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