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सिंधुस्थान - 1

Posted On: 6 Jun, 2014 Others में

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क्या भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और श्रीलंका एक हो सकते हैं????
विचित्र असंभव वाणी शायद कभी सत्य हो……????

गलत और अनैतिक उम्मीद है न ये?? लेकिन किस तरह से गलत और नीति के विरुद्ध है?????
विदेशी वित्त पोषित मीडिया घरानों के लिए एक नयी कहानी होगी? उनके इशारों पर यहीं के कथित देशभक्त चीखेंगे चिल्लाएँगे। अमेरिका – रूस – ब्रिटेन – चीन जैसे देशों का तो धंधा बंद हो जाएगा? कहाँ बेचेंगे अपने हथियार? कहाँ बेचेंगे अपनी कठोर व्यावसायिक कंपनियों के उत्पाद? अत्यधिक उपभोगी विलासी जीवन जीने वाले इनके नागरिक भूखों मरने लगेंगे ना ? जयचंद और मीर जाफर जैसे गद्दारों को पैसा देकर उकसाया जाएगा कि देशभक्ति के नाम पर मानवों को लामबंद करो। बहसें होंगी, मीडिया अनैतिक और विध्वंसकारी बयानों को उठाएगा जनता के बीच अपनी रेटिंग बढाने के लिए और व्यवसायियों की महत्वाकांक्षा मे निर्दोषों का गला रेता जाएगा। पेप्सी, रिन, कोलगेट, लक्स, नेस्कैफ़े बेचने वाला मीडिया कैसे इस संस्कृति का हो सकता है? अपनी संस्कृति में पूजी जाती कन्या आज के खुले विश्व में कैसे चीयरगर्ल बन गयी? किसको दोष दूँ, जब स्त्री का ही आजादी के नाम पर पतन हो जाएगा तो बच्चों का भविष्य कौन बचाएगा, कौन ममत्व और भावुकता का भाव लाएगा पीढ़ियों में??? कॉर्पोरेट चश्मे से इस उपमहाद्वीप को देखने वाले मानव का सपना अमेरिका, स्विट्जरलैंड, कनाडा और ब्रिटेन होता है न की अपना आध्यात्मिक रूढ़िवादी संसार।

कितने तथ्य हैं और कितने ही साक्ष्य हैं “सिंधुस्थान” की उम्मीद को संपूर्णता प्रदान करते। इतिहास को टटोलता हूँ तो एक कहानी साकार रूप लेने लगती है।

वो जंबूद्वीप जो चारों ओर समुद्र से घिरा था. पता नहीं ग्रन्थों ने इसको युगों में कैसे परिभाषित किया था??? उस उल्कापिंड के गिरने से महाप्रलय, फिर मनु की नौका में कुछ लोगों को बचाकर लाती हुई मानवता की कहानी हर सभ्यता के इतिहास में क्यों एक सी मिल जाती है? लोग बताते हैं मैन, मानव, इंसान उसी की संतान हैं। लेकिन दूसरी तरफ मानवता एक और करवट ले रही होती है जब गोंडवानालैंड या जम्बूद्वीप महाप्रलय के दौरान हुई उथल पुथल से टेक्टोनिक प्लेटों के विस्थापन द्वारा भारतीय उपमहाद्वीप को जन्म दे रहा होता है। तेजी से अफ्रीका से लगे टैथिस सागर को चीरता हुआ ये भूभाग जब मध्य एशिया से टकराता है तो इतिहास की महागाथा की शुरुआत होती है।

विरल पृथ्वी में सरल जीवन को जन्म देने के लिए हिमालय का उन्नत मस्तक जलवायु को स्थिर करता है और दूसरी तरफ सिंधु, ब्रह्मपुत्र और गंगा मानवता के इतिहास को गढ़ने लगती हैं. गंगा का दोआब, सिंध का पंजाब और ब्रह्मपुत्र का हिमालय का चंद्रहार बनना कोई सामान्य घटना नहीं थी वरन इस महाद्वीप को जीवन सुलभ बनाने का अनंत प्रयास शुरू हुआ था, जिसकी पुष्टि आज का पाश्चात्य विज्ञान भलीभांति कर रहा है।

प्राकृतिक आच्छादन व जंगलों का चरम विज्ञान इस धरा के जंगलियों की बुनियाद रखता है।

उद्भव होता है जीवन के सर्वश्रेष्ठ रूप की जब शिव का सूक्ष्म विज्ञान अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है। शिव के अन्वेषण में ऊर्जा का विस्मयकारी वर्णन हुआ. पाषाण लिंग में सूक्ष्म श्वेत बिन्दु पर ध्यान लगाकर परलौकिक अनुभव और मंद स्वर से “आ” “ऊ” “म” का नाद शरीर में स्थित प्रत्येक अणु की ऊर्जा को केन्द्रित कर देता था। इस अध्यात्म में कहीं भी किसी देवता की मूर्ति नहीं है, कहीं कोई अगरबत्ती नहीं है, कहीं कोई फूलमाला नहीं है और कहीं भी विधि विधानों से युक्त कोई कर्मकांड नहीं है।

एक फक्कड़ी, भभूत से सना, जंगलों-पहाड़ों-नदियों में रमता, भांग में मस्त, हिंसक-वनैले जीवों के साथ मन बहलाता, डमरू और शंख के नाद में उन्मत्त उछलता नाचता, अध्यात्म विज्ञान से मानव जीवन की व्याख्या करता अद्भुत योगी इस धरा पर मानवता का प्रकृति के साथ संगम कराता रहा।

जम्बू द्वीप अब एशिया का भाग बन चुका था. मानव बढ़ रहा था, परिवार बढ़ रहे थे और वंश फैल रहे थे………

यहाँ से निकला मानव इराक, ईरान, तुर्की, अरब, जेरूशलम, मिस्त्र जैसे मध्य और पश्चिम एशिया के इलाकों तक फैल गया। जिसका प्रमाण इनके ऐतिहासिक व धार्मिक लेख तो देते ही हैं साथ ही साथ समान लंबाई, बालों का काला रंग तथा बनावट, एक जैसी मूछें-दाढ़ी, चमड़ी का रंग, उँगलियों की बनावट, उन्नत ललाट, समान भावनात्मक रिश्ते, सहिष्णुता प्रधान हृदय व प्रकृति से अत्यधिक लगाव अपने जीन्स की एकात्मकता को स्वयं बयान करते हैं।

परंतु ये सहिष्णु मानव अफ्रीका के घुँघराले बालों, बलिष्ठ शरीर वालों तथा उत्तरी एशिया के भूरे बालों, अत्यधिक गौर, हिंसक व भूखे मानवों से नहीं लड़ पा रहा था. क्योंकि ये बड़ी सुलभ जलवायु का वासी था जिसे पेट भरने के लिए शरीर की बलिष्ठता का उपयोग नहीं करना पड़ता था और इसी वजह से अत्यधिक सहिष्णु – अहिंसक भी था साथ ही साथ मस्तिष्क की असाधारण क्षमता से परिपूर्ण भी।

अफ्रीका व यूरोप वासियों से ये मानव शरीर सौष्ठव में तो नहीं जीत सकता था परंतु अपने मस्तिष्क के जरिये वो इन पर आधिपत्य जमा सकता था, और इसका हल था पुरोहित वर्ग का अभ्युदय।

यहाँ से अध्यात्म या सूक्ष्म विज्ञान का अंत होना शुरू हुआ। अब मानव बिजली कौंधने को भगवान का प्रकोप मानने लगा, युद्धों में पुरोहितों का सक्रिय भाग होने लगा, वर्षा-तूफानों-मौसमी प्रकोप में भगवान का क्रोध समझाया जाने लगा, प्लेग जैसी महामारियों का इलाज पुरोहितों द्वारा मासूमों की बलि दिये जाने से होने लगा। हर घटना में भगवान का खौफ दिखाया जाने लगा। कर्मकांडों, मूर्तियों और विधि विधानों ने अध्यात्म पर अपना प्रभुत्व जमा लिया। शरीर से सौष्ठव व्यक्तियों के मस्तिष्क को काबू करने का ये सबसे सरल तरीका था. चूंकि अध्यात्म का स्थूलता से संबंध नहीं था इसलिए अब तक न तो मंदिर बने थे, न मंत्र लिखे गए थे, न इतिहास की आवश्यकता थी और न ही सभ्यताओं में भेद था।

परंतु अब मानसिक श्रम तथा शारीरिक श्रम पर जीवित मनुष्यों का जुड़ाव होने पर पुरोहितों की उपस्थिति ने स्थूल निर्माण पर ज़ोर डाला और “मानव” सभ्यताओं व धर्मों में लामबंद होने लगा। मिस्त्र, मेसोपोटामिया, माया, बेजेंटाईन, इंका, रोम, बेबीलोन, सिंधु इत्यादि इसका ज्वलंत उदाहरण थीं।

सम्पूर्ण विश्व का हृदय वो सूक्ष्म आध्यात्मिक भारत भी इस उथल पुथल से अछूता नहीं रह पाया। यहाँ पर भी सत्ता, धर्म और सभ्यताओं का टकराव शुरू हुआ। पहली बार यहाँ के श्रुत-प्राकृतिक पीढ़ियों के विज्ञान को लेखनी ने पत्तों-छालों पर समेटना शुरू किया और जंगली साधुओं ने वेदों को जन्म दिया।

इन वेदों के जरिये आज की पीढ़ी को पता चलता है की उस वक्त का विज्ञान आज के विज्ञान से कितना अधिक उन्नत था। जिन सिद्धांतों का विश्व अंधविश्वास कह कर उपहास उड़ाता रहा उनकी पुष्टि आज का विज्ञान कर रहा है। उदाहरणतः जैसे तरंगों के माध्यम से संजय द्वारा महाभारत का वर्णन आज के मोबाइल फोन, टी॰वी॰ इत्यादि ने समरूप कर दिया। “युग सहस्त्र योजन पर भानु, लील्यों ताही मधुर फल जानु” एक कड़ी है हनुमान चालीसा की, इसमें सूर्य की पृथ्वी से दूरी की सटीक लंबाई वर्णित है:-
1 युग = 12000 साल
1 सहस्त्र = 1000
1 योजन = 8 मील
1 मील = 1.6 किमी

= 12000×1000×8×1.6 = 153,600,000 किमी (नासा की भी लगभग यही गणना है)

रक्तबीज की बारंबार उत्पत्ति मानव क्लोनिंग की पहली घटना थी। सात रंगों मे सूर्य की रोशनी का विभाजन, पेड़-पौधों में भी जीवन होता है, अंग प्रत्यारोपण इत्यादि बाकी विश्व का मानव उन्नीसवीं शताब्दी में जान पाया। फोटान के भीतर हिग्स बोसॉन की उपस्थिति जानने के लिए सम्पूर्ण विश्व के वैज्ञानिक महा मशीन पर महाप्रयोग कर रहे हैं। लेकिन यहाँ के जंगली कृष्ण ने तो उससे भी सूक्ष्म प्राण, प्राण से सूक्ष्मतम आत्मा और आत्मा की यात्रा परमात्मा तक, को परिभाषित कर डाला था गीता में। जिस नैनो तकनीकी की तुम खोज करने जा रहे हो भारतीय विज्ञान का आधार ही वही था।

अरे अभी तो विश्व को अपने भौतिक साधनों से हजारों साल और खोजें करनी हैं शिव के अध्यात्म को समझने के लिए, कैसे उन्होने बिना इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के जान लिया था कि सूक्ष्मतम न्यूक्लियस के चारों ओर घेरा होता है, जिसका इलेक्ट्रान चक्कर लगाते हैं. शिवलिंग में स्थित बिन्दु और उसका घेरा इसका प्रमाण है. चेतन-अवचेतन जीवन की परिभाषा तय करने के लिए उसे अभी अथाह खोज करनी है, E=mc² पर अभी बहुत शोध करोगे तब जान पाओगे कि किस प्रकार सभी अणुओं की सामूहिक ऊर्जा जब केन्द्रित हो जाती है तो अंतर्ध्यान होना, शारीरिक स्थानांतरण, दीर्घ अथवा संकुचित होना और इससे भी अधिक रहस्यमयी “काल अथवा समय” की यात्रा कैसे संभव होती थी।

अभी तो शिव के “ॐ” के नाद को समझने के लिए तुम्हें शताब्दियाँ चाहिए जहाँ “आ”ऊ”म” के उच्चारण में अपने शरीर के एक एक अणु कि थिरकन को महसूस करोगे, देखोगे कि शरीर कैसे विलुप्त हो रहा है अध्यात्म के भँवर में।

लेकिन शिव के इस विज्ञान को समझने के लिए तुम्हारी बड़ी-बड़ी भीमकाय मशीनों तथा ऊर्जा के प्रकीर्णन की जरूरत नहीं है अपितु कुण्डलिनी शक्ति के रहस्य की आवश्यकता है। मानव की वास्तविक क्षमता का आंकलन अभी तुम्हारे लिए बहुत दूर की कौड़ी है. एक-एक बिन्दु से कैसे ऊर्जा प्रवाहित होती है और उसको मस्तिष्क द्वारा नियंत्रित करके कैसे असाध्य कार्य किए जा सकते हैं ये जानने के लिए तुमको, इतिहासों को सहेजती गंगा के जंगलों में घुसना पड़ेगा।

अध्यात्म अत्यंत दुर्लभ साधना है, साधारण मनुष्यों के लिए. जबकि मानव मस्तिष्क की क्षमता असीमित है और यह भी एक अकाट्य सत्य कि जो भी हम सोच लेते हैं वो हमारे लिए प्राप्य हो जाती है. गीता में मानव शरीर को दो भागों में विभक्त किया हुआ है, एक जिसे हम देखते हैं और दूसरा अवचेतन जिसे हम महसूस करते हैं, जब हम कोई भी प्रण लेते हैं तो मन का अवचेतन हिस्सा जागृत हो जाता है और वो भौतिक जगत के अणुओं के साथ अपना जोड़ स्थापित करने लगता है जिससे सभी जीवित अथवा निर्जीव आत्माएं अपना सहयोग देने लगती हैं और इसकी परिणति हमारी आत्मसंतुष्टि होती है जिसे सिर्फ हमारे अध्यात्म विज्ञान ने परिभाषित किया था।

लेकिन अब मानव भटक चुका था, पुरातन अध्यात्म की राह से। मानव मस्तिष्क को आसानी से काबू करने के लिए शिक्षित पुरोहित वर्ग ने सुलभ संहिताएँ लिखीं. उन्होने उन मूर्तियों में प्राण बताकर मानव को प्रेरित किया ईश्वर के करीब जाने के लिए। उन्होने पुराणों, आरण्यक, ब्राह्मण, मंत्रों, विधानों, आदि की रचना कर सरल अध्यात्म व मानव संहिता की नींव रखी। असंख्य प्राकृतिक रहस्यमयी प्रश्नों को भगवान की महिमा व प्रारब्ध निर्धारित बताकर तर्कों पर विराम लगा दिया गया तथा कटाक्ष करने वालों को अधर्मी कह कर बहिष्कृत किया जाने लगा। एक अजीब सी स्थिति का निर्माण हो गया था चरम विज्ञान के इस देश में।

मानवों का ऐसा भटकाव देख कर कृष्ण बहुत विचलित हुए। “गीता” वो रहस्यमयी अध्यात्म के शिखर की प्रतिविम्ब है जहाँ आज तक कोई भी ग्रंथ नहीं पहुँच पाया है। उसमें प्रत्येक पदार्थ चाहे वो निर्जीव हो अथवा सजीव – चाहे वो मूर्त हो अथवा अमूर्त, में अणुओं की ऊर्जा और उसको संचालित करने वाले प्राण की सूक्ष्म संज्ञा आत्मा है। अत्यंत अद्भुत व रहस्यमयी शिखर जहाँ प्राण अपनी धुरी का मोह छोड़ देते हैं और आत्मा इस जीवन चक्र से मुक्त हो जाती है। विज्ञान का पहला नियम “पदार्थ न तो उत्पन्न होता है और न नष्ट होता है सिर्फ स्वरूप बदलता है तीन स्थितियों अर्थात ठोस, द्रव्य और वायु में” लेकिन कृष्ण का शोध इससे भी गहन है जिसमे “आत्मा न तो उत्पन्न होती है और न नष्ट होती है सिर्फ़ शरीर बदलती है” उदाहरणत: निर्जीव लोहे में जब तक आत्मा रहती है उसका आकार स्थायित्व लिए रहता है लेकिन जब उसकी आत्मा साथ छोड़ देती है चूर्ण की भांति बिखरने लगता है। अभी तो हम जीवित और निर्जीव वस्तुओं का ही भेद नहीं समझ पाये हैं तो उनका अध्यात्म बहुत कठिन तथा सहस्त्राब्दियों का प्रयोग है हम जैसे भौतिक मानवों के लिए।

लेकिन इस अध्यात्म को भी मानवों की सत्ता लालसा ले डूबी। अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र ने भारत का विज्ञान मार डाला। सहस्त्रों सूर्यों ने भारत को शताब्दियों तक अंधकार में डुबो दिया।

कई युगों की खामोशी के बाद इतिहास फिर से लिखा जाने लगा। जीसस क्राइस्ट, मुहम्मद साहब, महात्मा बुद्ध, महावीर जैन और गुरु नानक अगली पीढ़ी के कुछ ऐसे महात्मा हुए, जिनको धार्मिक कट्टरता, धर्मांधता, अंधविश्वास, मानवीय संकीर्णता, राजनीति व पुरोहितीय विधानों का सामना करना पड़ा परंतु एक ज्योतिर्पुंज की भांति इन्होने झंझवातों को झेलते हुए मानवता को नयी दिशा दी और उसी शिव तथा कृष्ण के अध्यात्म का फिर से प्रसार किया। ये मायने नहीं रखता कि वो कितना सफल हुए लेकिन उन्होने असंख्य मानवों को असमय काल ग्रस्त और अनैतिक होने से बचाया तथा आध्यात्मिक संहिताओं को मानवता के स्वरूप में ढाला।

बड़ी कठिन और मार्मिक घटनाओं की साक्षी है इन महात्माओं की जीवनी। लेकिन फिर भी अपने दारुण कष्टों को भूलकर हमेशा सबका कल्याण ही करते रहे ये मानव। गीता में अध्यात्म का स्तर बहुत ऊंचा था जहाँ पर किसी भी प्रकार के यत्न और विधि द्वारा मानसिक शक्तियों की एकाग्रता का चरम उद्देश्य आत्मा का परमात्मा में विलीन हो जाना था। लेकिन इसकी आड़ में कर्मकांडों की बाढ़ सी आ गयी थी।

सबसे बुरी स्थिति से अरब जूझ रहा था, वहाँ की विरल जलवायु में मानव भोगी बन गया था। लाखों की तादाद में मानवों को खरीदा जाता, उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता, उनके परिवारों को तहस नहस कर दिया जाता, छोटे-छोटे अबोध बच्चों के सामने उनके माँ-बाप को बेच दिया जाता, स्त्री बलात्कार और विलास की वस्तु थी, किसी भी बीमारी की दशा में गुलामों के सामने उनके मासूम दुधमुहें बच्चों को गड़ासे से काटकर या कुएँ में फेंक कर बलि दे दी जाती थी। क्लियोपेट्रा जैसी सम्राज्ञी तो अपने होठों को रंगने के लिए सेविकाओं के होंठों के रक्त का प्रयोग करती थी।

…………..आगे जारी है…….

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shailesh001 के द्वारा
June 10, 2014

वृहद विमर्श .. कई बातें उठाई हैं आपने बात पूरी हुइ नही् है फिर भी लेख का संदेश जानना चाहूंगा.. पर यह वर्तमान आवश्यकता है .. और भविष्य भी. आपकी कुछ बातों का स्पष्टीकरण आज है.

ramyadav के द्वारा
June 18, 2014

आदरणीय शैलेश जी, आज बहुत विषम भविष्य की ओर बड़ी तेज़ी से विश्व अग्रसर है, इस स्थिति में हमको बिना धैर्य खोये, जाति-धर्म और सीमाओं से परे जाकर मानवता के लिये सम्मिलित प्रयास करना होगा. केवल एक या दो पीढियों नही बल्कि अनन्त सभ्यताओं का भविष्य वर्तमान के हाथों मे है। सिर्फ वन ही मानव की हर समस्या का समाधान है चाहे वो मानसिक विनाश हो, आध्यात्मिक विनाश हो अथवा स्थूल विनाश। और इसके लिए एकल प्रयास को सकल प्रयास में बदलना होगा…………..


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